Dr. Ravindra Pathak is having dual doctoral degree, one in Management on Employee Behaviour and another in
Commerce subject on the derivation of Management Philosophy from Shrimad Bhagavad Gita. His areas of
interest are HRM & OB, Bhagavad Gita, and Astrology, with a vision of blending of ancient Indian Wisdom with
Modern Management. In the practice of modern Management, he has researched and published extensively on the
integral aspects of Human Resource Management and Psychology disciplines. He delineated HRM theories into
practice and had published more than 45 research papers in journals of national and international repute. He
is having more than 16 years of experience in teaching and conducting sessions for students, faculty
members, and executives, particularly on Indian Knowledge System, Bhagavad Gita & Life Management,
Happiness, Stress Management, Human Values and Ethics.
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति
भारत:। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
इस श्लोक का अर्थ है: हे भारत
(अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण)
धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।
Shri Krishna
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7)
अध्याय 3 (1) : कर्मयोग
ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन ने कहा! हे जनार्दन, यदि आप बुद्धि को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं तब फिर आप मुझे इस भीषण युद्ध में भाग लेने के लिए...
अध्याय 3 (1) : कर्मयोग
ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन ने कहा! हे जनार्दन, यदि आप बुद्धि को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं तब फिर आप मुझे इस भीषण युद्ध में भाग लेने के लिए क्यों कहते हो? आपके अनेकार्थक उपदेशों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है। कृपया मुझे निश्चित रूप से कोई एक ऐसा मार्ग बताएँ जो मेरे लिए सर्वाधिक लाभदायक हो। परम कृपालु भगवान ने कहा, हे निष्पाप अर्जुन! मैं पहले ही ज्ञानोदय की प्राप्ति के दो मार्गों का वर्णन कर चुका हूँ। ज्ञानयोग उन मनुष्यों के लिए है जिनकी रुचि चिन्तन में होती है और कर्मयोग उनके लिए है जिनकी रुचि कर्म करने में होती है। न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकता है और न केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान में सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है। कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। वास्तव में सभी प्राणी प्रकृति द्वारा उत्पन्न तीन गुणों के अनुसार कर्म करने के लिए विवश होते हैं। जो अपनी कर्मेन्द्रियों के बाह्य घटकों को तो नियंत्रित करते हैं लेकिन मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करते हैं, वे निःसन्देह स्वयं को धोखा देते हैं और पाखण्डी कहलाते हैं। हे अर्जुन! लेकिन वे कर्मयोगी जो मन से अपनी ज्ञानेन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं और कर्मेन्द्रियों से बिना किसी आसक्ति के कर्म में संलग्न रहते हैं, वे वास्तव में श्रेष्ठ हैं।